काका ने रोटी पलटी, भतीजे ने तवा छीना... गूगली, डकैती या क्लीन बोल्ड?
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| अजित पवार और शरद पवार (फाइल फोटो) |
@ उमेश यादव |
महाराष्ट्र में राकांपा नेता अजित पवार ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली। ऐसा पहली बार है, जब राज्य में दो उपमुख्यमंत्री हो गए हैं। भाजपा नेता देवेंद्र फडणवीस भी महाराष्ट्र सरकार में उपमुख्यमंत्री हैं।
अजित ने रविवार को पांचवीं बार उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उनके आठ सहयोगियों को भी एकनाथ शिंदे सरकार में मंत्री बनाया गया है। शिंदे ने पिछले साल 30 जून को भाजपा के समर्थन से सरकार बनाई थी। तब फडणवीस ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी।
महाराष्ट्र में पहली बार उपमुख्यमंत्री पद तब बनाया गया था, जब राज्य में कांग्रेस (ओ) और कांग्रेस (इंदिरा) की सरकार थी। वसंतदादा पाटील कांग्रेस (ओ) से मुख्यमंत्री थे। नाशिकराव तिरपुड़े 5 मार्च से 18 जुलाई 1978 तक राज्य के पहले उपमुख्यमंत्री रहे थे। इनके अलावा अलग-अलग सरकारों में कई अन्य नेता उपमुख्यमंत्री रहे। हालांकि, यह पहली बार है, जब महाराष्ट्र में दो उपमुख्यमंत्री हैं।
इस बगावत ने 1978 के राजनीतिक घटनाक्रम की यादें ताजा कर दी हैं। तब शरद पवार ने तत्कालीन मुख्यमंत्री वसंत दादा पाटील की सरकार के खिलाफ बगावत की थी। पवार 40 विधायकों को लेकर कांग्रेस से अलग हो गए थे। इससे पाटील नीत तत्कालीन राज्य सरकार गिर गई थी। पवार ने 18 जुलाई 1978 को प्रगतिशील लोकतांत्रिक मोर्चा के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी। इसमें कई विपक्षी दल शामिल थे।
वर्ष 1978 में विधानमंडल सत्र चल रहा था। जानकारों का कहना है कि तत्कालीन गृह मंत्री नाशिकराव तिरपुड़े ने मुख्यमंत्री पाटील को आगाह किया था कि उद्योग मंत्री शरद पवार सरकार के लिए खतरा उत्पन्न कर रहे हैं। पाटील ने चेतावनी पर गंभीरता से नहीं ध्यान दिया था। पाटील ने कहा था शरद अभी मुझसे मिले थे। उसी दिन बाद में पाटील ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था।
अब की बार राकांपा में भी कुछ इसी तरह का घटनाक्रम रहा। पहले दिन में अजित ने मुंबई में अपने आधिकारिक आवास ‘देवगिरि’ में पार्टी के कुछ नेताओं और विधायकों के साथ बैठक की। बैठक में राकांपा के वरिष्ठ नेता छगन भुजबल और पार्टी की कार्यकारी अध्यक्ष सुप्रिया सुले उपस्थित थीं। हालांकि, सुप्रिया बैठक से जल्द चली गई थीं। जबकि शरद पवार ने पुणे में कहा कि उन्हें बैठक की जानकारी नहीं है। बाद में अजित पवार समेत कई नेताओं ने खुले तौर पर बगावत कर दी।
वर्ष 2019 के विधानसभा चुनाव के बाद उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने सहयोगी दल भाजपा से नाता तोड़ लिया था। राजभवन में एक समारोह में फडणवीस और अजित ने क्रमश: मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। यह सरकार केवल 80 घंटे चली थी। इसके बाद उद्धव ने महाविकास आघाड़ी सरकार बनाने के लिए राकांपा और कांग्रेस से हाथ मिलाया था। पिछले साल जून में शिवसेना में शिंदे गुट ने विद्रोह कर दिया था।शिवसेना में विभाजन हुआ। महाविकास आघाड़ी सरकार गिर गई। शिंदे ने भाजपा के समर्थन से सरकार बनाई।
कुछ दिनों पहले राकांपा प्रमुख शरद पवार ने कहा था कि रोटी पलटने का समय आ गया है। कुछ दिनों बाद भतीजे अजित को दरकिनार कर पवार ने बेटी सुप्रिया को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाने के संकेत दिए। राकांपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में बदलाव हुआ। इसके तहत राकांपा में दो कार्यकारी अध्यक्ष बनाए गए- सुप्रिया सुले और प्रफुल्ल पटेल। इस बात से अजित पवार नाराज दिख रहे थे। तब से वे बेचैन थे। बीच में उन्होंने कहा था कि वे विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद छोड़ना चाहते हैं। हालांकि, पहले से उनके बगावत के संकेत मिल रहे थे। अब यह कहना गलत नहीं होगा कि काका शरद पवार ने रोटी पलट दी। लेकिन भतीजे अजित पवार ने तवा छीन लिया।
अब शरद पवार भाजपा पर झल्लाते हुए कह रहे हैं कि यह घटनाक्रम कोई गुगली नहीं डकैती है। यह आसान चीज नहीं है। मीडिया ने पवार से पूछा था कि राकांपा के नौ नेताओं का आश्चर्यजनक कदम भाजपा का गेम-प्लान है या गुगली? दरअसल, पवार ने गुरुवार को कहा था कि 2019 के विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा को बेनकाब करने के लिए कुछ कार्य किए गए थे। यह दिखाने का प्रयास किया गया था कि भाजपा सत्ता हासिल करने के लिए कितनी दूर तक जा सकती है।
पवार ने कहा था कि उनके ससुर (टेस्ट खिलाड़ी सादु शिंदे) गुगली गेंदबाज थे। वे खुद (पवार) आईसीसी के चेयरमैन थे। पवार ने कहा था, ‘क्रिकेट खेले बिना मुझे पता है कि कहां और कब गुगली फेंकनी है।’ अब शिंदे ने कहा कि राजनीतिक घटनाक्रम से पता चलता है कि कोई क्लीन बोल्ड हुआ है। उन्होंने कहा कि यह हिट विकेट भी है। फडणवीस ने कहा, 'मेरे बजाय, पवार के भतीजे उनकी गुगली पर क्लीन बोल्ड हो गए।'
क्रिकेट की शब्दावली के जरिए फडणवीस और पवार के बीच वाकयुद्ध शुरू हुआ था। जनता राजनीतिक अवसरवाद का मैच देखने काे विवश है। किसे वोट दिया था, किसने सरकार बनाई, किसने गिराई, इससे क्या फर्क पड़ता है? अगले साल महाराष्ट्र में लोकसभा और विधानसभा चुनाव है। मतदाता इस उठापटक को कितना याद रखेगा, देखते हैं....।
(लेखक 'सुनो सुनो' के संपादक हैं।)
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