व्यंग्य : हवा पर मुकदमा

प्रतीकात्मक चित्र

| व्यंग्य |  

@ टीकाराम साहू 'आजाद' |

हवा का रुख देख कर चाल चलने वाले राजा के राज में ऐसी हवा चली कि राजा की हवा ही निकल गई। आत्ममुग्ध राजा दर्पण में अपना दढ़ियल रूप निहार रहे थे कि तेज हवा चली। हवा से राजा को अपना सिंहासन डोलता नजर आने लगा। तिरछी चाल चलने वाले राजा का मुकुट हवा से तिरछा हो गया। अनहोनी को होनी करने वाले राजा को अनहोनी की आशंका सताने लगी। तभी एक दरबारी हाजिर हुआ। राजा को झुककर प्रणाम किया। वैसे भी राजा को अपने सामने किसी का तनकर खड़े रहना गंवारा नहीं था। फिर वह जिनकी उंगली पकड़ कर राजनीति का पाठ सीखा वह गुरु ही क्यों न हो। सत्ता में आते ही मार्गदर्शक मंडल में बैठा दिया।

दरबारी बोला-'महाराज, आपने जिन मूर्तियों को राष्ट्र का गौरव बता कर फलां प्रांत में लोकार्पण किया था, वह मूर्तियां तेज हवा से टूट कर जमीन पर धूल चाट रही हैं। 

'क्या कह रहे हो?' राजा ने आश्चर्य मिश्रित भाव से कहा। 

'हां महाराज, यह सच है।'

झूठ बोलने में उस्ताद राजा को सच भी झूठ लगने लगा, क्योंकि वह झूठ को ही सच मानता था। सच बोलने वाले उसे फूटी आंखों नहीं सुहाते थे।

'दरबारी, तुम जानते हो झूठ बोलने की क्या सजा मिलेगी।' आदतन राजा ने दबाव बनाया।

'महाराज, मेरी बात झूठ निकले तो मुझे चौराहे पर फांसी पर लटका देना।' राजा अचंभे में पड़ गया, क्योंकि वह खुद कई बार यह डायलॉग मार चुका था। और फिर राजा झूठ बोल रहा है यह साबित करने का रिस्क कौन लेता, इसीलिए राजा फांसी पर लटकने से बचा हुआ था।

'क्या तुमने अपनी आंखों से देखा है?' राजा ने चोरी और सीनाजोरी के अंदाज में हड़काते हुए पूछा। 

'हां महाराज। किसी का गर्दन से सिर गायब है तो किसी के हाथ टूट कर चूर-चूर हो गए हैं और कोई गश खाकर औंधे मुंह पड़ा है।'

राजा को काटो तो खून नहीं, यह बात अलग है कि राजा के मुंह खून लग चुका था, इसलिए वह अक्सर खून-खराबे की बात करता था। राजा ने स्वयं को संभालते हुए (क्योंकि राज्य तो संभलने से रहा) तुरंत प्रांत के मुख्यमंत्री को बुलाकर मूर्तियों के टूटने की जांच के आदेश दिए। 

मुख्यमंत्री ने जांच समिति का गठन किया जिसमें कलेक्टर से लेकर कोतवाल तक सभी  शामिल थे। कलेक्टर ने 'हंगामा है क्यों बरपा...' के अंदाज में मूर्तियों के गिरने पर सवाल को ही गलत बताया, घटिया क्वालिटी को स्वीकार करना तो दूर की बात है। कलेक्टर का कहना था कि मूर्तियां वारंटी पीरियड में है, फिर बन जाएगी। 10 साल की मियाद है तो क्या हुआ, टूटने दो, 10 बार बना लेंगे। 

आखिरकार जांच रिपोर्ट भी आ गई। जांच समिति ने एकमत से माना कि मूर्तियां तो मजबूत थीं, लेकिन हवा अपनी निर्धारित गति से तेज चली। हवा को खुली हवा में सांस लेने की छूट दी, तो वह अपनी गति (औकात) ही भूल गई। अपनी गति का तो भान होना चाहिए। यह सरासर अपराध है। मूर्तियां टूट कर गिरने के लिए असली गुनहगार तेज हवा है न कि मानव। मूर्तियां बनवाने वाले और बनाने वाले निर्दोष है। भ्रष्टाचार के बारे में तो सोचना भी पाप है। हां, हवा को तेज चलने में हवा देने में विपक्ष की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। 

रिपोर्ट देख राजा मोगैंबो की तरह खुश हुआ, क्योंकि राजा को ऐसी ही रिपोर्ट की उम्मीद थी। भ्रष्टाचार होता तो राजा के नाते मुंह काला होने का डर था। 

अगले दिन राजा ने मीडिया के जरिए पूरे राज्य में मुनादी करवा दी। मूर्तियां गिरने के लिए तेज हवा जिम्मेदार है। राजा ने हवा के सिर पर इनाम रखा है। हवा को जिंदा या मुर्दा पकड़ कर लाने वाले को इनाम दिया जाएगा। राजा की अदालत में हवा पर मुकदमा चलेगा।

डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है कि तरह आज तक हवा को कोई पकड़ नहीं पाया है। डॉन की तरह हवा भी फरार है। इधर मूर्तियां बनवाने वाले तथा बनाने वाले को फिर अपनी पांचों उंगलियां घी में और सिर कढ़ाही में दिखाई दे रहाी है। नई मूर्तियों के लिए करोड़ों रुपए का फंड जो जारी हो गया है।

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