रामटेक से एक करोड़ ठगकर भागा 'रत्नागिरि का ठग', पीड़ित लगा रहे इंसाफ की गुहार

सचिन सावंत : 'रत्नागिरि का ठग'।

@ उमेश यादव |

रामटेक |  तस्वीर में दिख रहा व्यक्ति जितना सीधा नजर आ रहा है, उतना है नहीं। सज्जनता, मासूमियत और भलमनसाहत का मुखौटा लगाकर यह ठग रामटेक में दो साल तक रहा। लेकिन रामटेक के लोग इसकी असलियत नहीं पहचान सके। यह अपना नाम सचिन सावंत बताता था। इसका असली नाम रामटेक के लोग नहीं जानते। उम्र करीब 35 वर्ष है। रंग बादामी-सांवला है। ठेठ व्यापारियों और नेताओं की तरह कपड़े पहनता है। चश्मा लगाता है। इसने लोगों से दीदी, भैया, काका-काकी, मामा-मामी के रिश्ते बनाए। बाद में इन मुंहबोले रिश्तों से भारी विश्वासघात किया। करीब 30 लोगों से एक करोड़ रुपए की धोखाधड़ी कर रामटेक से रफूचक्कर हो गया। कहां गया पता नहीं।

ठग सचिन सावंत खुद को शेयर ब्रोकर बताता था। करीब डेढ़ साल तक इसने केवल लोगों से रिश्ते बनाए। उन पर पैसे लुटाए। कभी किसी को कपड़े खरीदकर देता। कभी किसी बच्चे को भतीजा-भांजा बनाकर खिलौने और चॉकलेट देता। एक शख्स को महंगी मोटरसाइकिल भी उपहार में दे दी।  यह मुंहबोले रिश्तेदारों के घर नाश्ता करता, खाना खाता। उनके यहां सुख-दुख, जन्म-मरण में साथ रहता। देखते ही देखते सचिन सावंत ने लोगों से मजबूत रिश्ता बना लिया। लोग इसके झांसे में आते गए। इसने आखिरी के छह महीने में रकम समेटना शुरू किया। इसके निशाने पर ज्यादातर व्यापारी-दुकानदार थे। इनमें किराना दुकानदार, कपड़ा दुकानदार, इलेक्ट्रॉनिक सामान व्यापारी, प्रिंटिंग प्रेस संचालक शामिल हैं। इसने अपने यहां काम करने वाले कर्मचारियों तक को ठगा। सबको इसने शेयर मार्केट में पैसा लगाने का लालच दिया। किसी को 10 प्रतिशत, किसी को 50 प्रतिशत और किसी को दोगुना मुनाफा का लालच देता रहा। इस तरह इसने करीब 30 लोगों से एक करोड़ रुपए झटक लिए। इनमें से करीब 10 लोगों ने पुलिस में शिकायत की है। इनकी करीब 35 लाख रुपए की रकम लेकर ठग सचिन सावंत भाग गया है। किसी से 10 लाख रुपए ठगे, किसी से 12 लाख, किसी से पांच लाख। हालांकि, पुलिस ने अभी तक मामले में एफआईआर नहीं दर्ज की है। क्यों? इसका जवाब अब तक स्पष्ट नहीं है। इस विषय में हम आगे चर्चा करेंगे। फिलहाल, यह जानते हैं कि ठग सचिन सावंत ने और क्या-क्या गुल खिलाए।

सचिन सावंत खुद को रत्नागिरि का निवासी बताता था। वह कहता था कि लोकसभा सांसद एवं शिवसेना नेता अरविंद सावंत उसके काका हैं। वह भी एक दिन अपने काका की तरह बड़ा नेता या मंत्री बनेगा। सचिन सावंत कोंकण और उत्तर महाराष्ट्र की मिलीजुली मराठी बोलता था। रामटेक में रहते हुए सचिन सावंत ने एक बार मकान बदला। पहले यह बस स्टैंड से करीब 400 मीटर दूर एक साधारण से मकान में रहता था। बाद में शीतलवाड़ी में जैस्वाल पेट्रोल पंप के पास एक अपार्टमेंट के फ्लैट में रहने लगा। यहीं से इसने अपनी जालसाजी के काले कारोबार का विस्तार किया। इसे किराना, इलेक्ट्रॉनिक सामान, चाय-नाश्ते के होटल, पानीपुरी की दुकान, प्रिटिंग प्रेस आदि स्थानों पर देखा जाता था। यह सबसे बेहद गर्मजोशी से मिलता था। होटल में कोई मिल जाए, तो उसे चाय-नाश्ता कराए बिना विदा नहीं करता था। गर्मी के दिनों में यह लोगों को कोल्ड ड्रिंग, शरबत पिलाता था। जालसाज सचिन सावंत अक्सर ऑटो रिक्शा से इधर-उधर जाता था। ऑटो का बिल 150 रुपए होता तो वह ऑटोवाले को 500 रुपए दे देता था। ऑटोवाला भी हैरान होकर दूसरों के पास सचिन सावंत का गुणगान करता था। ये सब सचिन की जालसाजी के छोटे-छोटे निवेश (इनवेस्टमेंट) थे। इन्हीं के बल पर इसने लाखों रुपए ठगने के मंसूबे पाल रखे थे। अपने मंसूबों में सफल भी हुआ।

रामटेक के लोगों के पास सचिन सावंत की यह इकलौती फोटो है। इसने रामटेक में कभी किसी के साथ अपनी फोटो नहीं खिंचाई। अपनी फोटो भी किसी को नहीं खींचने दी। इस बात का अहसास तब तक लोगों को नहीं हुआ, जब तक कि वे नहीं ठगे गए। आज समझ आता है कि सचिन सावंत होटलों, दुकानों में सीसीटीवी कैमरों से कैसे बचने की कोशिश करता था। रामटेक में इसकी इकलौती तस्वीर खींचे जाने की भी अपनी कहानी है। आप देख रहे हैं कि तस्वीर में शातिर ठग सचिन सावंत नीचे सिर झुकाए बैठा है। अनुमान लगा सकते हैं कि यह क्या कर रहा है? यह लाखों रुपए के नोट गिन रहा है। तस्वीर खींचने वाला भी कोई और नहीं, एक पीड़ित के पिता हैं। इस पीड़ित को ठग सचिन सावंत ने 12 लाख रुपए का चूना लगा दिया है। पीड़ित के पिता ने भी इसलिए तस्वीर खींची थी, ताकि अगर धोखाधड़ी हो तो कुछ काम आए। इसलिए शायद पहली बार सचिन सावंत के चेहरे पर थोड़ी हड़बड़ाहट दिख रही थी। अन्यथा यह हमेशा खिलंदड़ तरीके से ही रहता था। इस जालसाज ने अपने आपको इस तरह पेश किया था कि लोग इस पर 50 बार शक करते थे और 50 बार दोबारा विश्वास कर लेते थे। 

ठग सचिन सावंत ने सारी काली कमाई का लेखा-जोखा दूसरों के नाम पर रखा था। इसने कभी किसी को अपना आधार कार्ड, पैन कार्ड नहीं दिखाया, न कहीं इनकी फोटोकॉपी जमा की। इसने कुछ लोगों को अपनी ठगी का मोहरा बनाया। इसमें प्रमुख रूप से दो लोगों के नाम सामने आए हैं। पहला मोहरा होटल में वेटर है, दूसरा बस स्टैंड के पास पानीपुरी बेचता है। घटना उजागर होने के कुछ दिनों पहले से पानीपुरी वाला रामटेक में नहीं है। जबकि पुलिस ने होटल के वेटर से सख्त पूछताछ की। सचिन सावंत ने निवेशकों (इनवेस्टर्स) को आगे की तारीख के चेक बांटे थे। इन चेक पर ठग सचिन सावंत के हस्ताक्षर नहीं थे। इन चेक पर वेटर और पानीपुरी वाले के हस्ताक्षर थे। कभी कोई निवेशक सचिन से पूछता कि दूसरे के नाम का चेक क्यों दिया है तो वह कहता, 'सब अपने लोग हैं। मेरे कारोबार से जुड़े हैं। मैं हूं न? आप क्यों चिंता करते हैं।' बाद में ये सारे चेक बाउंस हो गए। यह देखकर पीड़ितों के पैरों तले जमीन खिसक गई।  सचिन ने वेटर को केसरी टूर एंड ट्रेवल्स नामक कंपनी में नौकरी दिलाने का वादा किया था। यही झांसा देकर उसने वेटर से मनमाफिक काम कराए थे। सचिन ने इसी वेटर के नाम से महंगी मोटरसाइकिल भी खरीदी थी। वह खुद मोटरसाइकिल नहीं चलाता था। दूसरों के घर ही मोटरसाइकिल रखता था।

आज सचिन सावंत की पहचान के लिए उसकी सिर झुकाई तस्वीर के अलावा कोई प्रमाण नहीं है। वह तस्वीर में संत गजानन महाराज के नीचे बैठा दिख रहा है। वह पूजा-पाठ, संत-महात्माओं के सानिध्य का खूब ढोंग करता था। लोग भी उसे सीधा-सादा ईश्वर का बंदा समझते थे। कौन जानता था कि वह गंदा धंधा कर रहा था। कौन जानता था कि 'रत्नागिरि का ठग' पावनभूमि रामटेक को अशुद्ध करने आया था। अगर सचिन सावंत ने रिश्ते बनाकर धोखाधड़ी नहीं की होती तो शायद पीड़ितों को इतना दुख नहीं होता। सवाल है कि क्या ऐसे धोखेबाज लोगों को रिश्ते-नातों से कोई लेना-देना होता है। तो आपको यह भी बताते हैं कि रामटेक में सचिन सावंत दो महिलाओं के साथ रहता था। एक को वह अपनी पत्नी और दूसरी को सास बताता था। जब कोई निवेशक उससे रकम मांगता तो वह पहले कोई बहाना बनाकर टालमटोल करता था। इससे बात नहीं बनती तो वह अपनी कथित सास को अस्पताल में भर्ती कर देता था। उसके बाद लोगों से कहता कि सासू मां बीमार है। अभी व्यस्त हूं। जल्दी मिलकर रकम दे दूंगा। पीड़ितों को शक है कि सचिन के साथ रहने वाली महिलाएं भी नकली पत्नी और नकली सास रही होंगी। भागने से पहले सचिन सावंत ने दबाव में आकर एक-दो लोगों को दो-तीन लाख रुपए लौटाए भी थे। अगर कोई ज्यादा दबाव बनाता तो वह कहता कि दो-चार दिन रुको, तिगुनी-चौगुनी रकम लौटाऊंगा। ये सब उसकी जालसाजी के हथकंडे थे। वह ऐसा दिखावा करता था, जैसे उसके लिए पैसों की कोई कीमत नहीं है।

हम यह रिपोर्ट किसी ठग की प्रशंसा के लिए प्रकाशित नहीं कर रहे हैं। मकसद यही है कि लोग ठगों से सावधान रहें। जिस क्षेत्र का ज्ञान नहीं हो, वहां बिना सोचे-समझे धन निवेश न करें। अन्यथा वही हाल हो सकता है, जो इस मामले के पीड़ितों का हुआ। इन पीड़ितों ने अपनी खून-पसीने की कमाई एक जालसाज के हाथों में दे दी। कोई इन रुपयों से अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाना चाहता था, किसी ने अपने व्यापार का विस्तार करने की सोची थी। किसी ने छोटी-छोटी बचत कर कोई बड़ा सपना पूरा करने का लक्ष्य रखा था। 

शोकांतिका यह है कि इस मामले में अब तक एफआईआर नहीं दर्ज की गई है। जबकि पीड़ितों ने आठ दिन पहले ही थाने जाकर शिकायत की थी। स्पष्ट नहीं है कि एफआईआर क्यों नहीं दर्ज की गई। पुलिस के अपने तकनीकी कारण हो सकते हैं। हम पुलिस की ईमानदारी पर सवाल नहीं उठा रहे हैं। हम उस व्यवस्था से सवाल पूछ रहे हैं, जिसे आम समाज, राजनीति, पुलिस, अदालत और कानून मिलकर बनाते हैं। क्या इस व्यवस्था में इंसाफ के लिए गुहार लगाना आसान रह गया है? यह कहना आसान हो सकता है कि पीड़ितों ने लालच में आकर मूर्खता की। इसका परिणाम वे भुगत रहे हैं। सवाल है कि आखिर कब तक यही बात कहकर पीड़ा और बढ़ाई जाएगी।  दूसरों को मूर्ख और खुद को होशियार समझना सबसे बड़ी मूर्खता है। समय से बड़ा बलवान कोई नहीं है। जो लोग पीड़ितों पर हंस रहे हैं, उनकी क्रूरता पर तरस आता है। ध्यान रखें, जिन लोगों पर ठग सचिन सावंत की निगाह नहीं पड़ी, वे खुशकिस्मत हैं, अन्यथा वे भी उसे पांच-दस लाख का चढ़ावा चढ़ा देते।

और अंत में....

पुलिस पांच- दस हजार रुपए चुराने वाले चोर को पकड़ती है। उस चोर के साथ सात-आठ पुलिसकर्मी-अधिकारी सीना तानकर अपनी तस्वीर खिंचाते हैं। मीडिया को भेजे जाने वाले प्रेसनोट में दर्जन से अधिक पुलिसकर्मियों और अधिकारियों के नाम होते हैं। ऐसी तस्वीरें तभी सार्थक हो सकती हैं, जब सचिन सावंत जैसे शातिर को पकड़ने के बाद खिंचाई जाए। ध्यान रखिए, सचिन सावंत आम चोर-उचक्का नहीं है। वह रामटेक से एक करोड़ रुपए ठग कर भागा है। न जाने कहां-कहांं उसने और कांड किए होंगे? आम लोगों के लिए न्याय का पहला दरवाजा पुलिस थाना है। पीड़ित जनता पुलिस की ओर बेहद उम्मीदों से देखती है। यह उम्मीद नहीं टूटनी चाहिए। 

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(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और 'सुनो सुनो' के संपादक हैं। राष्ट्रीय साप्ताहिक 'राष्ट्र पत्रिका' से बतौर सहयोगी संपादक जुड़े हैं। इससे पहले दैनिक भास्कर समूह में करीब 14 साल रहे। नवभारत, लोकमत समाचार, राजस्थान पत्रिका में भी कुछ समय काम किया। रक्षा विशेषज्ञ भी हैं।)  

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