श्रद्धांजलि : राजनीति के अखाड़े में कितने सफल रहे पहलवान और शिक्षक मुलायम?

मुलायम सिंह यादव (फाइल फोटो)

@ उमेश यादव |

समाजवादी पार्टी के संस्थापक और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव का निधन हो गया। वे कई दिनों से बीमार थे। आज की पीढ़ी शायद नहीं जानती होगी कि मुलायम सिंह यादव ने कभी पहलवानी भी की थी। आज भी मुलायम के गांव सैफई के लोग उनके 'चरखा दांव' को नहीं भूले हैं। यह ऐसा दांव था, जिसमें मुलायम अपने हाथों का इस्तेमाल किए बिना पहलवान को चारों खाने चित कर देते थे। 

शिक्षक बनने के बाद मुलायम ने पहलवानी करनी पूरी तरह से छोड़ दी थी। लेकिन अपने जीवन के आखिरी समय तक वे अपने गांव में दंगलों का आयोजन कराते रहे। कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कुश्ती के गुर की वजह से ही मुलायम राजनीति के अखाड़े में भी सफल रहे। मुलायम की कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं थी। उनका जन्म 22 नवंबर 1939 को सैफई में हुआ था।

मुलायम की प्रतिभा को सबसे पहले प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के नेता नाथू सिंह ने पहचाना था। नाथू ने 1967 के चुनाव में जसवंतनगर विधानसभा सीट का टिकट मुलायम को दिलवाया था। उस समय मुलायम की उम्र सिर्फ 28 साल थी। वे यूपी के इतिहास में सबसे कम उम्र के विधायक बने थे। उन्होंने विधायक बनने के बाद अपनी एमए की पढ़ाई पूरी की थी। साल 1977 में उत्तर प्रदेश में रामनरेश यादव के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी। तब मुलायम सिंह यादव को सहकारिता मंत्री बनाया गया। उस समय उनकी उम्र सिर्फ 38 साल थी।

मुलायम को चौधरी चरण सिंह अपना राजनीतिक वारिस और बेटे अजीत सिंह को कानूनी वारिस कहा करते थे। पिता के गंभीर बीमार होने के बाद अजीत सिंह अमेरिका से भारत लौटे। तब समर्थकों के एक वर्ग ने अजीत सिंह को पार्टी का अध्यक्ष बनाने पर जोर दिया। उसके बाद मुलायम सिंह और अजीत सिंह में प्रतिद्वंद्विता बढ़ी। हालांकि, यूपी का मुख्यमंत्री बनने का मौका मुलायम सिंह को मिला। मुलायम ने 5 दिसंबर, 1989 को पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। तब मुलायम ने रुंधे गले से कहा था कि लोहिया का गरीब के बेटे को मुख्यमंत्री बनाने का सपना साकार हो गया है।

मुख्यमंत्री बनते ही मुलायम ने यूपी में तेजी से उभर रही भाजपा का मजबूती से सामना करने का फैसला किया। मुलायम ने कहा- 'बाबरी मस्जिद पर एक परिंदा भी पर नहीं मार सकेगा।' इस बात ने मुलायम को मुसलमानों के बहुत करीब ला दिया। इस बीच 2 नवंबर 1990 को कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद की तरफ बढ़ने की कोशिश की। तब कारसेवकों पर लाठीचार्ज किया गया, गोलियां चलाई गईं। इसमें कई कारसेवक मारे गए। इस घटना के बाद से भाजपा समर्थक मुलायम सिंह यादव को 'मौलाना मुलायम' कहने लगे। 

मुलायम ने 4 अक्टूबर 1992 को समाजवादी पार्टी की स्थापना की। उन्हें लगा कि वे अकेले भाजपा को नहीं रोक पाएंगे। इसलिए उन्होंने कांशीराम की बहुजन समाज पार्टी के साथ चुनावी गठबंधन किया। तब मुलायम सिंह ने कांग्रेस और बसपा के समर्थन से यूपी में दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। लेकिन यह गठबंधन बहुत दिनों तक नहीं चला क्योंकि बसपा ने कई मांगें रख दीं। 

मुलायम ने 29 अगस्त 2003 को तीसरी बार यूपी के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इस बीच उनकी अमर सिंह से गहरी दोस्ती हो गई। मुलायम ने अमर सिंह को राज्यसभा का टिकट दे दिया। बाद में उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव भी बना दिया। इसलिए पार्टी के कई बड़े नेताओं ने मुलायम से दूरी बना ली।

मुलायम 1996 में केंद्र की संयुक्त मोर्चा सरकार में रक्षा मंत्री बने। एचडी देवेगौड़ा के इस्तीफे के बाद मुलायम प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गए। मुलायम राजनीति में कभी विश्वसनीय सहयोगी नहीं माने गए। पूरी उम्र चंद्रशेखर उनके नेता रहे। लेकिन जब 1989 में प्रधानमंत्री चुनने की बात आई तो उन्होंने वीपी सिंह का समर्थन किया। बाद में वीपी सिंह से भी उनका मोह भंग हो गया। तब उन्होंने दोबारा चंद्रशेखर का दामन थाम लिया।

वर्ष 2002 में एनडीए ने राष्ट्रपति पद के लिए एपीजे अब्दुल कलाम का नाम आगे किया। तब वामपंथी दलों ने कलाम के खिलाफ कैप्टन लक्ष्मी सहगल को उतारा। मुलायम ने आखिरी समय पर वामपंथियों को छोड़ते हुए कलाम की उम्मीदवारी पर मोहर लगा दी। साल 2019 के आम चुनाव में भी उन्होंने सबको चौंका दिया। मुलायम ने कहा कि वे नरेंद्र मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री बनते देखना चाहते हैं।

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