नागपुर : पेंच के जंगल में बसे गांव कोलीतमारा में 700-800 वोटों की तलाश, इतने तो शहरी मोहल्ले में मिल जाएंगे

| कोलीतमारा से लौटकर उमेश यादव |

नागपुर की पारशिवनी तहसील का छोटा सा गांव कोलीतमारा। आबादी 2,000 के करीब। इनमें करीब 900 वोटर होंगे। पारशिवनी तहसील कार्यालय से कोलीतमारा तक पहुंचने के लिए करीब 35 किमी की दूरी तय करनी होती है। खेतों-खलिहानों के बीच से सड़क गुजरती है। बीच में बनेरा और सुवरधारा जैसे गांव मिलते हैं। इन गांवों में आदिवासियों के साथ ही अन्य जाति समुदाय के लोग रहते हैं। छोटे स्कूल, छोटी कच्ची-पक्की दुकानें सड़कों के आसपास दिखाई देती हैं।

कोलीतमरा में पक्की सड़क वहीं, जहां आसपास मकान।

स्थानीय राजनीतिक मामलों के जानकार रणवीर यादव हमारे साथ हैं। वे कहते हैं, ‘बरसों तक यह क्षेत्र सावनेर विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा रहा है। इस क्षेत्र के नेता मंत्री भी बने हैं। लेकिन विकास के नाम पर कुछ नहीं दिखता। वही टूटे-फूटे मकान आज भी हैं। राजनेता 700-800 वोटों के लिए यहां तक आते हैं। चुनाव प्रचार करते है। जबकि शहरों में इतने वोट एक मोहल्ले में ही मिल जाते हैं।’

चारागाहों से लौटते चरवाहे और गोवंश।

गांवों को पार करते हुए हम पेंच व्याघ्र प्रकल्प (टाइगर रिजर्व) पहुंचते हैं। इसी वनक्षेत्र में कोलीतमारा बसा है। शाम हो रही है। बच्चे-युवक गोवंश के साथ जंगल के चारागाहों से लौट रहे हैं। तीन बच्चे कुछ पौधों के बंडल कंधे पर लादे चले जा रहे हैं। साथी मनीष घोष बताते हैं कि इस पौधे की धुनी करने से मच्छर भाग जाते हैं। आजकल मच्छर अगरबत्ती बनाने में भी इस पौधे का इस्तेमाल होता है। मैं पौधे का नाम पूछता हूं। लेकिन मनीष भैया ऐसा नाम बताते हैं, जो कभी नहीं सुना। शायद इसलिए अब याद भी नहीं रहा। मैं तीनों बच्चों से पूछता हूं। क्या स्कूल जाते हो? वे मुस्कराते हैं। फिर मैं कहता हूं- कोरोना के कारण शायद स्कूल बंद होंगे। शहर में रहने वाले मुझ जैसे लोगों के लिए यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि जंगल के गांवों में कोराना पहुंचा था या नहीं।

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दूर एक स्कूल दिखता है। हमारे साथ कोलीतमारा ग्राम पंचायत के पूर्व पदाधिकारी विट्‌ठल पाटील हैं। वे बताते हैं कि कोलीतमारा में स्कूल पहले से ही है। दसवीं तक की कक्षाएं लगती हैं। कुछ बच्चे बाहर भी पढ़ने जाते हैं। मैं दूर से ही स्कूल की तस्वीर खींचने की कोशिश करता हूं। लेकिन फोटो ठीक नहीं खिंचती। थोड़ी कोशिश के बाद कुछ धुंधलाहट के साथ मोबाइल के कैमरे में स्कूल की तस्वीर कैद हो जाती है।

वैसे तो कोलीतमारा में दिन-रात जंगली जानवरों की चहलकदमी रहती है। लेकिन रात को ज्यादा। इसलिए ग्रामीण शाम होते- होते घर लौट जाते हैं। जल्दी सोना और जल्दी जागना ग्रामीणों की दिनचर्या है। जितने क्षेत्र में गांव की आबादी रहती है, उतने में पक्की सड़क है। गांव से बाहर कच्ची सड़क ही है। बारिश में यहां आवागमन का क्या हाल होता होगा, अनुमान लगाना कठिन नहीं।

हम गांव के भीतर जाने वाली कच्ची सड़क के पास खड़े हैं। गांव के भीतर नैनो से लेकर सफारी जैसे वाहन जाते दिखते हैं। हमारे साथ पंचायत समिति, रामटेक के पूर्व उपसभापति उदय सिंह उर्फ गज्जू यादव हैं। वे अपने सहयोगियों के साथ प्रकल्प परिसर की जमीनों का मुआयना करने चले जाते हैं। मै साथियों अभिनव चौधरी, सागर लोंडे और अन्य के साथ सड़क के किनारे खड़े होकर ही जंगल और कोलीतमारा गांव पर चर्चा कर रहा हूं। शाम तेजी से रात की ओर बढ़ रही है। इस बीच विट्‌ठल पाटील हमारे पास आते हैं। कहते हैं-गाड़ी मोड़ो। घर चलो। यहां तक आए हो तो चाय पीये बिना जाएंगे क्या? इन शब्दों में आदर, प्यार, मासूमियत को पूरे अधिकार के साथ जताने की ताकत है।

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हम पाटील साहब के घर पहुंचते हैं। हमारे आने की सूचना घर के लोगों को पहले ही मिल गई है। अभी सूरज की किरणों की उपस्थिति वातावरण में है। मैं गहरा अंधेरा होने से पहले जरूरी फोटो खींच लेना चाहता हूं। इसलिए साथियों से थोड़ा अलग होकर गांव के और अंदर चला जाता हूं। वहां काम की दो-तीन तस्वीरें खींचकर पाटिल साहब के घर लौटता हूं।

पाटिल साहब के घर के आंगन में करीब 20 कुर्सियां लग गई हैं। अगरबत्ती की खुशबू वातावरण में है। साथ ही घर के आंगन के एक कोने में कार भी खड़ी है। संतोष होता है, यह समझकर कि अचानक किसी को अस्पताल पहुंचाने की जरूरत हो तो गाड़ी उपलब्ध हो जाती होगी। एक ग्रामीण से पूछता हूं, गांव में कोई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है? क्या वहां डॉक्टर आता है? कंपाउडर तो आता ही होगा? लेकिन ग्रामीण ठीक से जवाब नहीं दे पाता।

इस बीच सभी साथी हर 5-10 मिनट में मोबाइल नेटवर्क न मिलने की शिकायत कर रहे हैं। वे जंगल में खींची गईं तस्वीरें सोशल मीडिया पर तत्काल साझा करना चाहते हैं। लेकिन नहीं कर पाते। नेटवर्क न होने से सारा उत्साह ठंडा पड़ जाता है। पाटिल साहब के घर-परिवार के सदस्य हमारे आत्मीय स्वागत में जुटे हैं। इस बीच गज्जू भैया भी सहयोगियों के साथ हमारे पास आ चुके हैं। ग्रामीणों के साथ बातचीत चल रही है। गज्जू भैया कहते हैं, ‘गांव में एक युवक से मिलकर आ रहा हूं। युवक के पैर की हड्‌डी टूट गई है। पैसे न होने के कारण युवक दो महीने से ऑपरेशन नहीं करा पा रहा है। अब एक निजी अस्पताल में उसके ऑपरेशन की व्यवस्था कर दी है। युवक कबड्‌डी का अच्छा खिलाड़ी रहा है।’

गज्जू भैया मोबाइल पर किसी से बात करना चाहते हैं। लेकिन नेटवर्क नहीं मिल रहा। मुझसे पूछते हैं, ‘आपके मोबाइल में नेटवर्क है।’ मैं कहता हूं, ‘नहीं। बात करने लायक भी नहीं। इंटरनेट तो बिल्कुल नहीं।’ गज्जू भैया के पास बैठा एक साथी कंधे के ऊपर उठाकर मोबाइल रखता है। अब बात करने लायक नेटवर्क मिल जाता है। गज्जू भैया मोबाइल कंपनी से जुड़े किसी व्यक्ति से मोबाइल टावर के बारे में बात करते हैं। वह कोलीतमारा में मोबाइल टावर लगाने की प्रक्रिया बताता है।

अब हम कोलीतमारा के साथियों से विदा लेकर गाड़ी में सवार हैं। रात हो चुकी है। संकरी सड़क और अंधे मोड़ हैं। अभिनव कुशलता के साथ गाड़ी चला रहे हैं। हम सुवरधरा गांव में एक मकान के सामने रुकते हैं। गज्जू भैया और दो-तीन साथी एक मकान में जाते हैं। मेरे साथ बाहर रुके एक साथी बताते हैं कि वे लोग किसी स्थानीय बीमार साथी से मिलने घर में गए हैं। सुवरधरा भी जंगल के बीच बसा गांव है। दो-चार दुकानें दुधिया लाइट के साथ रौशन है। कुछ कच्चे-पक्के मकानों के पास एक कार खड़ी है।

कोलीतमारा… जंगल में बसी इंसानी बस्ती की मासूमियत और संघर्ष को कुछ शब्दों में समेट पाना मुश्किल है। हम कोलीतमारा से करीब 50-55 किमी का सफर तय कर रामटेक लौट आए हैं।

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