हिंदी और भगत सिंह| अंतिम भाग : समस्त एकताओं से पहले एक भाषा जरूरी, ताकि हम एक-दूसरे को भली-भांंति समझ सकें
साल 1924 की बात है। पंजाब में भाषा-विवाद चल रहा था। पंजाबी भाषा की लिपि के प्रश्न पर उर्दू और हिंदी के पक्षधरों में बहस जारी थीे। क्रांतिकारी भगत सिंह भी इस बहस पर अपने विचार बनाने लगे थे। पंजाब की भाषा और लिपि की समस्या पर यह लेख उन्होंने पंजाब हिंदी साहित्य सम्मेलन के आमंत्रण पर लिखा था। अव्वल मानकर सम्मेलन ने इस पर 50 रुपए का इनाम भी दिया था। भगत सिंह का यह लेख सम्मेलन के प्रधानमंत्री श्री भीमसेन विद्यालंकार ने सुरक्षित रखा और भगत सिंह के बलिदान के बाद 28 फरवरी, 1933 के ‘हिंदी संदेश’ के अंक में प्रकाशित किया।
देश में इन दिनों हिंदी पखवाड़ा मनाया जा रहा है। इसी महीने की 28 सितंबर को भगत सिंह की जयंती भी है। 'सुनो सुनो' देश और समाज के प्रति भगत सिंह के विचारों से प्रेरणा ग्रहण करता है। इसी उपलक्ष्य में यहां भगत सिंह का लेख प्रकाशित किया जा रहा है। पढ़िए, लेख का अंतिम भाग...
- संपादक
-----------------
शेष भारत में भारतीय भाषाएंं और लिपियांं प्रचलित हैं। ऐसी अवस्था में पंजाब में उर्दू का प्रचार कर क्या हम भारत से एकदम अलग-थलग हो जाए? नहीं। और फिर सबसे बड़ी बात तो यह है कि उर्दू के कट्टर पक्षपाती मुसलमान लेखकों की उर्दू में फारसी का ही आधिक्य रहता है। ‘जमींदार’ और ‘सियासत’ आदि मुसलमान-समाचारपत्रों में तो अरबी का जोर रहता है, जिसे एक साधारण व्यक्ति समझ भी नहीं सकता। ऐसी दशा में उसका प्रचार कैसे किया जा सकता है ? हम तो चाहते हैं कि मुसलमान भाई भी अपने मजहब पर पक्के रहते हुए ठीक वैसे ही भारतीय बन जाएं, जैसे कि कमाल टर्क (तुर्क) हैं। भारतोद्धार तभी हो सकेगा। हमें भाषा आदि के प्रश्नों को मार्मिक समस्या न बनाकर खूब विशाल दृष्टिकोण से देखना चाहिए।
इसके बाद हम हिंदी-पंजाबी भाषाओं की समस्या पर विचार करेंगे। बहुत-से आदर्शवादी सज्जन समस्त जगत को एक राष्ट्र, विश्व राष्ट्र बना हुआ देखना चाहते हैं। यह आदर्श बहुत सुंदर है। हमें भी इसी आदर्श को सामने रखना चाहिए। उस पर पूर्णतया आज व्यवहार नहीं किया जा सकता, परंतु हमारा हर एक कदम, हमारा हर एक कार्य इस संसार की समस्त जातियों, देशों तथा राष्ट्रों को एक सुदृढ़ सूत्र में बांंधकर सुख-वृद्धि करने के विचार से उठना चाहिए। उससे पहले हमें अपने देश में यही आदर्श कायम करना होगा। समस्त देश में एक भाषा, एक लिपि, एक साहित्य, एक आदर्श और एक राष्ट्र बनाना पड़ेगा, परंतु समस्त एकताओं से पहले एक भाषा का होना जरूरी है, ताकि हम एक-दूसरे को भली-भांंति समझ सकें।
एक पंजाबी और एक मद्रासी इकट्ठा बैठकर केवल एक-दूसरे का मुंंह ही न ताका करें, बल्कि एक-दूसरे के विचार तथा भाव जानने का प्रयत्न करें, परंतु यह परायी भाषा अंग्रेजी में नहीं, बल्कि हिंदुस्तान की अपनी भाषा हिंदी में हो। यह आदर्श भी, पूरा होते-होते अभी कई वर्ष लगेंगे। उसके प्रयत्न में हमें सबसे पहले साहित्यिक जागृति पैदा करनी चाहिए। केवल गिनती के कुछेक व्यक्तियों में नहीं, बल्कि सर्वसाधारण में। सर्वसाधारण में साहित्यिक जागृति पैदा करने के लिए उनकी अपनी ही भाषा आवश्यक है। इसी तर्क के आधार पर हम कहते हैं कि पंजाब में पंजाबी भाषा ही आपको सफल बना सकती है।
अभी तक पंजाबी साहित्यिक भाषा नहीं बन सकी है और समस्त पंजाब की एक भाषा भी वह नहीं है। गुरुमुखी लिपि में लिखी जाने वाली मध्य पंजाब की बोलचाल की भाषा को ही इस समय तक पंजाबी कहा जाता है। वह न तो अभी तक विशेष रूप से प्रचलित ही हो पाई है और न ही साहित्यिक तथा वैज्ञानिक ही बन पाई है। उसकी ओर पहले तो किसी ने ध्यान ही नहीं दिया, परंतु अब जो सज्जन उस ओर ध्यान भी दे रहे हैं, उन्हें लिपि की अपूर्णता बेतरह अखरती है। संयुक्त अक्षरों का अभाव और हलंत न लिख सकने आदि के कारण उसमें भी ठीक-ठीक सब शब्द नहीं लिखे जा सकते, और तो और, पूर्ण शब्द भी नहीं लिखा जा सकता। यह लिपि तो उर्दू से भी अधिक अपूर्ण है और जब हमारे सामने वैज्ञानिक सिद्धांतों पर निर्भर सर्वांगसंपूर्ण हिंदी लिपि विद्यमान है, फिर उसे अपनाने में हिचक क्याें? गुरुमुखी लिपि तो हिंदी अक्षरों का ही बिगड़ा हुआ रूप है। सब नियम मिलते हैं। फिर एकदम उसे ही अपना लेने से कितना लाभ हो जाएगा ? सर्वांग संपूर्ण लिपि को अपनाते ही पंजाबी भाषा उन्नति करना शुरू कर देगी और उसके प्रचार में कठिनाई ही क्या है? पंजाब की हिंदू स्त्रियांं इसी लिपि से परिचित हैं। डीएवी स्कूलों और सनातन धर्म स्कूलों में हिंदी ही पढ़ाई जाती है। ऐसी दशा में कठिनाई ही क्या है? हिंदी के पक्षपाती सज्जनों से हम कहेंगे कि निश्चय ही हिंदी भाषा ही अंत में समस्त भारत की एक भाषा बनेगी, परंतु पहले से ही उसका प्रचार करने से बहुत सुविधा होगी। हिंदी लिपि के अपनाने से ही पंजाबी हिंदी की-सी बन जाती है। फिर तो कोई भेद ही नहीं रहेगा। इसकी जरूरत इसलिए है कि सर्वसाधारण को शिक्षित किया जा सके और यह अपनी भाषा के अपने साहित्य से ही हो सकता है. पंजाबी की यह कविता देखिए –
ओ राहिया राहे जांदया, सुन जा गल मेरी,
सिर ते पग तेरे वलैत दी, इहनूं पफूक मआतड़ा ला।।
और इसके मुकाबले में हिंदी की बड़ी-बड़ी सुंदर कविताएंं कुछ प्रभाव न कर सकेंगी, क्योंकि वह अभी सर्वसाधारण के हृदय के ठीक भीतर अपना स्थान नहीं बना सकी हैं। वह अभी कुछ बहुत परायी-सी दिख पड़ती है। कारण कि हिंदी का आधार संस्कृत है। पंजाब उससे कोसों दूर हो चुका है। पंजाबी में फारसी ने अपना प्रभाव बहुत कुछ रखा है। यथा, चीज का जमा ‘चीजें’ न होकर फारसी की तरह ‘चीजां’ बन गया है। यह असूल अंत तक कार्य करता दिखाई देता है। कहने का तात्पर्य यह है कि पंजाबी के निकट होने पर भी हिंदी अभी पंजाबी-हृदय से काफी दूर है। हांं, पंजाबी भाषा के हिंदी लिपि में लिखे जाने पर और उसके साहित्य बनाने के प्रयत्न में निश्चय ही वह हिंदी के निकटतर आ जाएगी।
प्रायः सभी मुख्य तर्कों पर तर्क किया जा चुका है। अब केवल एक बात कहेंगे। बहुत-से सज्जनों का कथन है कि पंजाबी भाषा में माधुर्य, सौंदर्य और भावुकता नहीं है। यह सरासर निराधार है। अभी उस दिन – ‘लच्छीए जित्थे तू पानी डोलिया ओत्थे उग पये संदल दे बूटे’ वाले गाने के माधुर्य ने कवींद्र रवींद्र तक को मोहित कर लिया। वे झट अंग्रेजी में अनुवाद करने लगे – O Lachi, where there spilt water, where there spilt water etc etc.…
और बहुत-से और उदाहरण भी दिए जा सकते हैं। निम्न वाक्य क्या किसी अन्य भाषा की कविताओं से कम है? –
पिपले दे पत्तया वे केही खड़खड़ लायी ऐ।
पत्ते झड़े पुराने हुण रुत्त नवयां दी आयी आ।।
और फिर जब पंजाबी अकेला अथवा समूह बैठा हो तो ‘गौहर’ के ये पद जितना प्रभाव करेंगे, उतना कोई और भाषा क्या करेगी?
लाम लक्खां ते करोड़ां दे शाह वेखे न मुसािफरां कोई उधार देंदा,
दिने रातीं जिन्हां दे कूच डेरे न उन्हां दे थायीं कोई एतबार देंदा।
भौरे बहंदे गुलां दी वाशना ते ना सप्पा दे मुहां ते कोई प्यार देंदा
गौहर समय सलूक हन ज्यूंदया दे मोयां गियां नूं हर कोई विसार देंदा।
और फिर –
जीम ज्यूदियां नूं क्यों मारना ऐं, जेकर नहीं तूं मोयां नूं जिऔण जोगा
घर आये सवाली नूं क्यों घूरना ऐं, जेकर नहीं तू हत्थीं खैर पौण जोगा
मिले दिलां नूं क्यों बिछोड़ना ऐं, जेकर नहीं तू बिछड़यां नू मिलौण जोगा
गौहरा बदीयां रख बंद खाने, जेकर नहीं तू नेकीआं कमौण जोगा।
और फिर अब तो दर्द, मस्ताना, दीवाना बड़े अच्छे-अच्छे कवि पंजाबी की कविता का भंडार बढ़ा रहे हैं।
ऐसी मधुर, ऐसी विमुग्धकारी भाषा तो पंजाबियों ने ही न अपनाई, यही दु:ख है। अब भी नहीं अपनाते, समस्या यही है। हरेक अपनी बात के पीछे मजहबी डंडा लिए खड़ा है। इसी अड़ंगे को किस तरह दूर किया जाए। यही पंजाब की भाषा तथा लिपि विषयक समस्या है, परंतु आशा केवल इतनी है कि सिखों में इस समय साहित्यिक जागृति पैदा हो रही है। हिंदुओं में भी है। सभी समझदार लोग मिलकर-बैठकर निश्चय ही क्यों नहीं कर लेते। यही एक उपाय है इस समस्या को हल करने का। मजहबी विचार से ऊपर उठकर इस प्रश्न पर गौर किया जा सकता है, वैसे ही किया जाए, और फिर अमृतसर के ‘प्रेम’ जैसे पत्र की भाषा को जरा साहित्यिक बनाते हुए पंजाब यूनिवर्सिटी में पंजाबी भाषा को मंजूर करा देना चाहिए। इस तरह सब बखेड़ा तय हो जाता है। इस बखेड़े के तय होते ही पंजाब में इतना सुंदर और ऊंचा साहित्य पैदा होगा कि यह भी भारत की उत्तम भाषाओं में गिनी जाने लगेगी। (समाप्त)
(साभार : 'भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज')


टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें