हिंदी और भगत सिंह| भाग-1 : मेजिनी के 30 साल के साहित्यिक परिश्रम से मिलीं गैरीबाल्डी को सेनाएं

भगत सिंह।

साल 1924 की बात है। पंजाब में भाषा-विवाद चल रहा था। पंजाबी भाषा की लिपि के प्रश्न पर उर्दू और हिंदी के पक्षधरों में बहस जारी थीे। क्रांतिकारी भगत सिंह भी इस बहस पर अपने विचार बनाने लगे थे। पंजाब की भाषा और लिपि की समस्या पर यह लेख उन्होंने पंजाब हिंदी साहित्य सम्मेलन के आमंत्रण पर लिखा था। अव्वल मानकर सम्मेलन ने इस पर 50 रुपए का इनाम भी दिया था। भगत सिंह का यह लेख सम्मेलन के प्रधानमंत्री श्री भीमसेन विद्यालंकार ने सुरक्षित रखा और भगत सिंह के बलिदान के बाद 28 फरवरी, 1933 के ‘हिंदी संदेश’ के अंक में प्रकाशित किया। 

देश में इन दिनों हिंदी पखवाड़ा मनाया जा रहा है। इसी महीने की 28 सितंबर को भगत सिंह की जयंती भी है। 'सुनो सुनो' देश और समाज के प्रति भगत सिंह के विचारों से प्रेरणा ग्रहण करता है। इसी उपलक्ष्य में यहां भगत सिंह का लेख प्रकाशित किया जा रहा है। पढ़िए, लेख का भाग-1...

- संपादक

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‘किसी समाज अथवा देश को पहचानने के लिए उस समाज अथवा देश के साहित्य से परिचित होने की परम आवश्यकता होती है, क्योंकि समाज के प्राणों की चेतना उस समाज के साहित्य में भी प्रतिच्छवित हुआ करती है।’

उपरोक्त कथन की सत्यता का इतिहास साक्षी है। जिस देश के साहित्य का प्रवाह जिस ओर बहा, ठीक उसी ओर वह देश भी अग्रसर होता रहा। किसी भी जाति के उत्थान के लिए ऊंचे साहित्य की आवश्यकता हुआ करती है। ज्यों-ज्यों देश का साहित्य ऊंचा होता जाता है, त्यों-त्यों देश भी उन्नति करता जाता है। देशभक्त, चाहे वे निरे समाज-सुधारक हों अथवा राजनीतिक नेता, सबसे अधिक ध्यान देश के साहित्य की ओर दिया करते हैं। यदि वे सामाजिक समस्याओं तथा परिस्थितियों के अनुसार नवीन साहित्य की सृष्टि न करें तो उनके सब प्रयत्न निष्फल हो जायें और उनके कार्य स्थायी न हो पायें।

शायद गैरीबाल्डी को इतनी जल्दी सेनाएं न मिल पातीं, यदि मेजिनी ने 30 वर्ष देश में साहित्य तथा साहित्यिक जागृति पैदा करने में ही न लगा दिये होते। आयरलैंड के पुनरुत्थान के साथ गैलिक भाषा के पुनरुत्थान का प्रयत्न भी उसी वेग से किया गया। शासक लोग आयरिश लोगों को दबाये रखने के लिए उनकी भाषा का दमन करना इतना आवश्यक समझते थे कि गैलिक भाषा की एक-आध कविता रखने के कारण छोटे-छोटे बच्चों तक को दण्डित किया जाता था। रूसो, वाल्टेयर के साहित्य के बिना फ्रांस की राज्यक्रान्ति घटित न हो पाती। यदि टालस्टाय, कार्ल मार्क्स तथा मैक्सिम गोर्की इत्यादि ने नवीन साहित्य पैदा करने में वर्षों व्यतीत न कर दिये होते, तो रूस की क्रांति न हो पाती, साम्यवाद का प्रचार तथा व्यवहार तो दूर रहा।

यही दशा हम सामाजिक तथा धार्मिक सुधारकों में देख पाते हैं। कबीर के साहित्य के कारण उनके भावों का स्थायी प्रभाव दिख पड़ता है। आज तक उनकी मधुर तथा सरस कविताओं को सुनकर लोग मुग्ध हो जाते हैं। ठीक यही बात गुरु नानकदेव जी के विषय में भी कही जा सकती है। सिख गुरुओं ने अपने मत के प्रचार के साथ जब नवीन संप्रदाय स्थापित करना शुरू किया, उस समय उन्होंने नवीन साहित्य की आवश्यकता भी अनुभव की और इसी विचार से गुरु अंगददेव जी ने गुरुमुखी लिपि बनायी। शताब्दियों तक निरंतर युद्ध और मुसलमानों के आक्रमणों के कारण पंजाब में साहित्य की कमी हो गयी थी। हिंदी भाषा का भी लोप-सा हो गया था। इस समय किसी भारतीय लिपि को ही अपनाने के लिए उन्होंने कश्मीरी लिपि को अपना लिया। तत्पश्चात गुरु अर्जुनदेव जी तथा भाई गुरुदास जी के प्रयत्न से आदिग्रंथ का संकलन हुआ। अपनी लिपि तथा अपना साहित्य बनाकर अपने मत को स्थायी रूप देने में उन्होंने यह बहुत प्रभावशाली तथा उपयोगी कदम उठाया था।

उसके बाद ज्यों-ज्यों परिस्थिति बदलती गयी, त्यों-त्यों साहित्य का प्रवाह भी बदलता गया। गुरुओं के निरंतर बलिदानों तथा कष्ट-सहन से परिस्थिति बदलती गयी। जहां हम प्रथम गुरु के उपदेश में भक्ति तथा आत्मविस्मृति के भाव सुनते हैं और निम्नलिखित पद में कमाल आजिजी का भाव पाते हैं :

नानक नन्हे हो रहे, जैसी नन्हीं दूब।
और घास जरि जात है, दूब खूब की खूब।।

वहीं पर हम नवें गुरु श्री तेगबहादुर जी के उपदेश में पददलित लोगों की हमदर्दी तथा उनकी सहायता के भाव पाते हैं :

बांहि जिन्हां दी पकड़िये, सिर दीजिये बांंहि न छोड़िये।
गुरु तेगबहादुर बोलया, धरती पै धर्म न छोड़िये।।

उनके बलिदान के बाद हम एकाएक गुरु गोविंद सिंह जी के उपदेश में क्षात्र धर्म का भाव पाते हैं। जब उन्होंने देखा कि अब केवल भक्ति-भाव से ही काम न चलेगा, तो उन्होंने चंडी की पूजा भी प्रारंभ की और भक्ति तथा क्षात्र धर्म का समावेश कर सिख समुदाय को भक्तों तथा योद्धाओं का समूह बना दिया। उनकी कविता (साहित्य) में हम नवीन भाव देखते हैं।

वे लिखते हैं :
जे तोहि प्रेम खेलण का चाव, सिर धर तली गली मोरी आव।
जे इत मारग पैर धरीजै, सिर दीजै कांण न कीजै।।

और फिर –
सूरा सो पहिचानिये, जो लड़ै दीन के हेत।
पुर्जा-पुर्जा कट मरै, कभूं न छांड़ै खेत।।

और फिर एकाएक खड्ग की पूजा प्रारंभ हो जाती है।

खग खंड विहंड, खल दल खंड अति रन मंड प्रखंड।
भुज दंड अखंड, तेज प्रचंड जोति अभंड भानुप्रभं।।

उन्हीं भावों को लेकर बाबा बंदा आदि मुसलमानों के विरुद्ध निरंतर युद्ध करते रहे, परंतु उसके बाद हम देखते हैं कि जब सिख सम्प्रदाय केवल अराजकों का एक समूह रह जाता है और जब वे गैर-कानूनी (Outlaw) घोषित कर दिये जाते हैं, तब उन्हें निरन्तर जंगलों में ही रहना पड़ता है. अब इस समय नवीन साहित्य की सृष्टि नहीं हो सकी. उनमें नवीन भाव नहीं भरे जा सके. उनमें क्षात्र-वृत्ति थी, वीरत्व तथा बलिदान का भाव था और मुसलमान शासकों के विरुद्ध (Outlaw) युद्ध करते रहने का भाव था, परंतु उसके बाद क्या करना होगा, यह वे भली-भांति नहीं समझे। तभी तो उन वीर योद्धाओं के समूह (felysa) आपस में भिड़ गये। यहीं पर सामयिक भावों की त्रुटि बुरी तरह अखरती है। यदि बाद में रणजीत सिंह जैसा वीर योद्धा और चालाक शासक न निकल आता, तो सिखों को एकत्रित करने के लिए कोई उच्च आदर्श अथवा भाव शेष न रह गया था। (जारी...)

(साभार : 'भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज')

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