आवरण कथा : महाराष्ट्र में भाजपा का राष्ट्रवाद, वन विभाग में रहना है तो 'वंदे मातरम' कहना होगा!
@ उमेश यादव
सुधीर मुनगंटीवार (फाइल फोटो)।
भाजपा राष्ट्रवाद की राजनीति करती है। विभिन्न वर्ग राष्ट्रवाद की परिभाषा अपनी-अपनी सुविधा और विचार के अनुसार गढ़ते हैं। स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रवाद के कई प्रतीक थे। उनमें से 'वंदे मातरम' एक है। महाराष्ट्र में इन दिनों उस गठबंधन की सरकार है, जिसमें भाजपा अहम भूमिका में है। इसलिए यहां राष्ट्रवाद के प्रतीकों का इस्तेमाल को समर्थन मिलता है। अब महाराष्ट्र के वन विभाग ने अपने कर्मियों से आह्वान किया है कि वे सरकारी कामकाज से संबंधित फोन आने पर ‘वंदे मातरम’ बोलकर जवाब दें। विभाग ने इसका आदेश भी जारी कर दिया है।
आदेश में कहा गया है कि वन विभाग के सभी अधिकारी एवं कर्मचारी सरकारी कामकाज के सिलसिले में आम लोगों या जन प्रतिनिधियों के फोन रिसीव करते समय हेलो की जगह 'वंदे मातरम' बोलें। इससे पहले राज्य के नवनियुक्त संस्कृति एवं वन मंत्री सुधीर मुनगंटीवार ने कहा था, ‘हम आजादी के 76 वें साल में कदम रख रहे हैं। हम अमृत महोत्सव मना रहे हैं। इसलिए मैं चाहता हूं कि अधिकारी फोन पर हेलो के बजाय ‘वंदे मातरम’ कहें।’ यह आदेश इसलिए चौंकाता है कि अमूमन वर्दी वाले सरकारी विभागों में कर्मचारी-अधिकारी अभिवादन के लिए 'जय हिंद' कहते हैं।
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| बंकिम चंद्र चटोपाध्याय। |
बहरहाल 'वंदे मातरम' कविता की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। बंकिम चंद्र बांग्ला भाषा के शीर्ष साहित्यकारों में गिने जाते हैं। उन्होंने अपने लेखन से न सिर्फ बंगाल बल्कि पूरे देश को प्रभावित किया। बंकिम चंद्र विद्वान लेखक थे। कम लोगों को पता है कि उनकी पहली प्रकाशित कृति बांग्ला में न होकर अंग्रेजी में थी। नाम था- 'राजमोहन्स वाइफ।' उनकी पहली प्रकाशित बांग्ला कृति 'दुर्गेशनंदिनी' थी। यह मार्च 1865 में छपी थी। 'दुर्गेशनंदिनी' एक उपन्यास था। आगे चलकर बंकिम चंद्र को महसूस हुआ कि उनकी असली प्रतिभा काव्य लेखन के क्षेत्र में है। तब उन्होंने कविताएं लिखना शुरू कीं। उन्होंने 'आनंदमठ' उपन्यास की रचना की। आनंदमठ की कहानी 1772 में पूर्णिया, दानापुर और तिरहुत में अंग्रेजों और स्थानीय मुस्लिम राजा के खिलाफ संन्यासियों के विद्रोह की घटना से प्रेरित है। इसमें बाद में 'वंदे मातरम' को भी शामिल किया गया। बंकिम चंद्र ने इसकी रचना 1870 के दशक में की थी। देखते ही देखते 'वंदे मातरम' पूरे देश में राष्ट्रवाद का प्रतीक बन गया।
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कितने आश्चर्य की बात है कि कुछ लोग 'वंदे मातरम' को 'जन गण मन' के सामने खड़ा कर देते हैं। ऐसे लोगों को जानकर आश्चर्य होगा कि राष्ट्रगान 'जन गण मन' की रचना करने वाले गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने 'वंदे मातरम' लिए धुन तैयार की। उसके बाद 'वंदे मातरम' की लोकप्रियता तेजी से बढ़ने लगी। अप्रैल 1894 में बंकिम चंद्र का निधन हुआ। इसके 12 वर्ष बाद क्रांतिकारी बिपिन चंद्र पाल ने एक राजनीतिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। उसका नाम 'वंदे मातरम' रखा। स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय भी इसी नाम से एक राष्ट्रवादी पत्रिका का प्रकाशन कर चुके थे। स्वतंत्र भारत का नया संविधान लिखा जा रहा था। लेकिन तब 'वंदे मातरम' को राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत का दर्जा नहीं मिला। हालांकि, संविधान सभा के अध्यक्ष और देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 24 जनवरी 1950 को घोषणा की कि वंदे मातरम को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया जा रहा है।
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बंकिम चंद्र ने भारत को दुर्गा का स्वरूप मानते हुए 'वंदे मातरम' की रचना की थी। इस वजह से 'वंदे मातरम' को मुस्लिम लीग और मुस्लिम समुदाय का एक वर्ग शक की नजरों से देखता था। इसी विवाद के कारण देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू 'वंदे मातरम' को स्वतंत्र भारत के राष्ट्रगान के रूप में नहीं स्वीकार करना चाहते थे। दरअसल, मुस्लिम लीग और मुसलमानों का एक वर्ग देश को भगवान का रूप देने के खिलाफ था। नेहरू ने रवींद्रनाथ टैगोर से 'वंदे मातरम' को स्वतंत्रता आंदोलन का मंत्र बनाने के लिए राय मांगी थी। रवींद्रनाथ टैगोर बंकिम चंद्र की कविताओं और राष्ट्रभक्ति के प्रशंसक रहे थे। इसलिए उन्होंने नेहरू से कहा कि 'वंदे मातरम' के पहले दो छंदों को ही सार्वजनिक रूप से गाया जाए।
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