आवरण कथा : नाशिक में 10,000 रु. में बंधुआ बाल मजदूर, पुलिस ने 8 बच्चों को आजाद कराया
@ सुनो सुनो रिपोर्ट |
महाराष्ट्र के नाशिक में एक जनजातीय समुदाय भारी आजीविका के संकट से जूझ रहा है। कोरोनाकाल के दौरान इस समुदाय के सामने भूखे रहने की नौबत आ गई थी। भले ही कोरोना का असर बहुत कम हो गया है। लेकिन इससे उपजे हालात उक्त समुदाय में नहीं बदले हैं। शायद इसी कारण यह समुदाय अपने बच्चों को लेकर बेहद अनैतिक फैसला ले रहा है। इस समुदाय के लोग साल में 10,000 रुपए के बदले अपने बच्चों को गड़ेरियों को सौंप रहे हैं। गड़ेरिये इन बच्चों से बंधुआ मजदूरी करा रहे हैं।
पुलिस ने पूरा मामला उजागर किया। बताया गया है कि अब तक 8 बच्चों को गड़ेरियों के चंगुल से मुक्त कराया गया है। हाल ही में मजदूर के रूप में काम करने वाली एक 11 वर्षीय बच्ची की मौत हो जाने के बाद यह मामला प्रकाश में आया। इस संबंध में हत्या का मामला दर्ज किया गया है।
सूत्रों के मुताबिक नाशिक ग्रामीण पुलिस ने पड़ोसी जिले अहमदनगर से अब तक ऐसे 8 बच्चों को छुड़ाया है। वहीं, बच्ची की हत्या के मामले में दो लोगों को गिरफ्तार किया है। तीन अन्य को बंधुआ मजदूरी व्यवस्था (उन्मूलन) अधिनियम-1976 के तहत गिरफ्तार किया गया है।
दरअसल, सिन्नर रोड पर घोटी क्षेत्र के उबाडे गांव में पिछले महीने वह बच्ची एक जनजातीय सामुदायिक शिविर के बाहर बेहोश हालत में मिली थी। वहां 12 परिवार सड़क किनारे बने अस्थायी तंबू में रह रहे थे। स्थानीय लोगों का कहना है कि किसी ने बच्ची को शिविर के बाहर छोड़ दिया था। पुलिस और बच्ची के परिवार के लोग उसे अस्पताल ले गए। वहां इलाज के दौरान इसी महीने बच्ची की मौत हो गई।
पूछताछ के दौरान पता चला कि बच्ची और उसके 10 वर्षीय भाई को अहमदनगर में गड़ेरियों के हवाले कर दिया गया था। बच्ची साल में एक या दो बार अपने माता-पिता से मिलने आती थी। वह 21 अगस्त से बेहोश थी। उसे सर्पदंश के बाद अहमदनगर और पुणे के अस्पतालों में भर्ती कराया गया था। बाद में उसे उसके माता-पिता के पास भेज दिया गया।
नाशिक ग्रामीण पुलिस ने मामले पर गंभीरता से ध्यान दिया। विस्तृत जांच की। पुलिस ने पाया कि 6 से 15 साल की उम्र के कम से कम 11 ऐसे बच्चों को उनके परिवार के सदस्यों ने अहमदनगर में गड़ेरियों को सौंप दिया था।
सूत्रों का कहना है कि बच्ची के बेहोश हालत में मिलने के बाद पुलिस ने शुरू में अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 307 (हत्या का प्रयास) के तहत प्राथमिकी दर्ज की। बाद में इसे हत्या के मामले में बदल दिया। इस मामले में दो लोगों को गिरफ्तार किया गया है। मौत का असल कारण पता नहीं चला है। पुलिस मामले में चिकित्सकीय राय का इंतजार कर रही है। लेकिन किसी भी तरह के यौन उत्पीड़न से इनकार किया गया है।
जांच में पता चला है कि माता-पिता ने 10,000 रुपए प्रतिवर्ष तक की रकम और एक बकरी या भेड़ हासिल करने के बदले में अपने बच्चों को एजेंट के माध्यम से गड़ेरियों को दे दिया था। बच्चों से भेड़ और बकरियों की रखवाली कराई जा रही थी। इसके पीछे हिसाब यह है कि अगर एक वयस्क को काम पर रखा जाता है, तो उसे भोजन और आवास के अलावा 3,000 रुपए से 5,000 रुपए प्रति माह का भुगतान करना होगा। लेकिन बच्चों के आवास और भोजन पर तुलनात्मक रूप से कम खर्च आएगा।
बच्चों के माता-पिता का कहना है कि महामारी के दौरान उनकी आजीविका चली गई थी। तब उन्होंने बच्चों को गड़ेरियों को सौंप दिया। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई अन्य बच्चे अब भी गड़ेरियों के चंगुल में हो सकते हैं।
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