तीन साल बाद विधानमंडल का शीतसत्र नागपुर में, विदर्भ की जनता को दिया आश्वासन न भूले भाजपा
![]() |
| नागपुर स्थित महाराष्ट्र विधान भवन। (फाइल फोटो) |
महाराष्ट्र विधानमंडल का शीतसत्र बहुत से आंदोलनकारियों के लिए उम्मीद बनकर आता है, जबकि कई लोग इस सत्र को केवल छलावा ही मानते हैं। नागपुर शहर ने कई राजनीतिक उतार चढ़ाव देखे हैं। शीतसत्र के दौरान पूरी सरकार मुंबई से उठकर नागपुर आ जाती है। सभी जानते हैं कि पिछले तीन साल से नागपुर में शीतसत्र नहीं हुआ है । अब इस साल 2022 में 19 दिसंबर से नागपुर में शीतसत्र होने की घोषणा महाराष्ट्र सरकार ने कर दी है। विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर भी इस बात के स्पष्ट संकेत दे चुके हैं।
'शिंदे-फडणवीस सरकार' का नागपुर में यह पहला शीतसत्र होगा। माना जा रहा है कि सत्र तीन सप्ताह चलेगा। महाराष्ट्र में अब तक के करीब सभी शीतसत्र नागपुर में ही हुए हैं। लेकिन महाविकास आघाड़ी सरकार इस मामले में अपवाद साबित हुई। कोराना संकट और महाविकास आघाड़ी सरकार के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे का स्वास्थ्य खराब होने के कारण दो साल शीतसत्र नागपुर में नहीं हो पाया।
![]() |
| देवेंद्र फडणवीस, एकनाथ शिंदे (फाइल फोटो)। |
नागपुर करार के अनुसार महाराष्ट्र विधानमंडल के तीन सत्रों में से एक सत्र नागपुर में होना चाहिए। भाजपा ने नागपुर करार के सम्मान की बात कहकर बजट सत्र उपराजधानी में आयोजित करने की मांग की थी। लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को ऑपरेशन के कारण डॉक्टर ने यात्रा की अनुमति नहीं दी थी, इसलिए बजट सत्र मुंबई में ही करना पड़ा था।
नागपुर में शीतसत्र के दौरान पृथक विदर्भ राज्य की मांग अक्सर उठाई जाती है । तथाकथित विदर्भवादियों ने समय-समय पर इस मांग को उछालकर सत्ता का खूब आनंद लूटा, कुछ ने जमकर राजनीतिक लाभ भी उठाया। कभी कभी इसी मुद्दे को अपनी ओर बुमरंग की तरह लौटता देखकर आंदोलनकारी अपना बचाव करते भी नजर आए। सत्ता प्राप्त होते ही पृथक विदर्भ के नाम पर चुप्पी साध लेना और सत्ता से हटते ही बरसाती मेंढक की तरह चिल्लाहट शुरू कर देना इन राजनेताओं का अब तक शौकिया खेल रहा है। विदर्भ की जनता ने ऐसे नेताओं को समय समय पर अच्छा सबक भी सिखाया है। साल 1996 के लोकसभा चुनाव में विदर्भ ने 9 भाजपाइयों को सांसद बनाकर संसद में भेजा था। इसके बावजूद पृथक विदर्भ राज्य नहीं बना तो आगे के चुनाव में भाजपा को करारी हार का सामना भी करना पड़ा। पहले शिवसेना के दबाव में आकर भाजपा 'पृथक विदर्भ' की मांग से पल्ला झाड़ती रही है। इसलिए 1998 के लोकसभा चुनाव में विदर्भ ने कांग्रेस-रिपाइं युति के सभी 11 उम्मीदवारों को जिताया था। इसके बावजूद पृथक विदर्भ राज्य का गठन नहीं हुआ।
![]() |
| ADVT |
विदर्भ का दुर्भाग्य रहा कि उसे रत्नाप्पा कुंभार या बालासाहब देसाई जैसे क्षेत्रीय विकास में रुचि लेने वाले नेता नहीं मिले। इसकी किस्मत में पृथक विदर्भ के नाम पर सत्ता का लाभ लेने वाले नेताओं का ही जमावड़ा रहा। जबकि गांधीवादी कार्यकर्ता पोट्टि श्रीरामलू ने आंध्र राज्य की मांग के लिए लंबी भूख हड़ताल की थी। भूख हड़ताल के 58वें दिन श्रीरामलू का निधन हो गया था, जिसके बाद आंध्र जल उठा था। बाद में पं. जवाहरलाल नेहरू ने पृथक आंध्र राज्य की घोषणा की थी। विदर्भ को पोट्टि श्रीरामलू जैसा जांबाज कार्यकर्ता मिलता, तो यह भी राज्य बन सकता था।
![]() |
| ADVT |
दिसंबर 1997 को पृथक विदर्भ की मांग को लेकर नागपुर में एक सम्मेलन आयोजित किया गया था। तब शिवसेना प्रमुख बालासाहब ठाकरे ने इस मांग का खुला विरोध किया था। उन्होंने कहा था कि 1998 तक रुकिये। हम विदर्भ का ऐसा विकास करेंगे कि पृथक राज्य के मांग की जरूरत नहीं पड़ेगी। विदर्भ विकास के लिए 'बालासाहब की शिवशाही सरकार' ने भगवी पत्रिका प्रस्तुत की थी। हालांकि, उसमें विदर्भ के विकास के लिए किसी ठोस पहल का जिक्र नहीं था। अधिकांश प्रस्ताव विचाराधीन रखे गए या फिर धनराशि के अभाव में स्थगित पड़े रहे। भगवी पत्रिका पूरी तरह निराधार साबित हुई।
विदर्भ राज्य के मांग की पहली चिंगारी 1912 में उड़ी थी, तब अखिल भारतीय कांग्रेस अधिवेशन में तत्कालीन अध्यक्ष अमरावती के प्रसिद्ध अधिवक्ता रंगनाथ मुधोलकर ने पृथक विदर्भ राज्य का प्रस्ताव रखकर उसे पारित करवा लिया था। उसके बाद 1920 में नागपुर अधिवेशन में महात्मा गांधी के सामने भी विदर्भ की मांग रखी गई थी। देश स्वतंत्र होने के बाद 1948 में प. जवाहरलाल नेहरू, पट्टाभि सीतारामय्या एवं वल्लभभाई पटेल का जेवीपी कमीशन बैठा। उसने भी पृथक विदर्भ की मांग को मंजूर कर लिया था। साल 1955 में सैयद फजल अली के नेतृत्व वाले पुनर्रचना आयोग ने भी पृथक विदर्भ की मांग मंजूर की थी। आयोग ने कहा था कि पृथक विदर्भ राज्य व्यावहारिक एवं आर्थिक दृष्टि से सक्षम होगा।
कांग्रेस पृथक विदर्भ राज्य की मांग को अधिकृत रूप से उठाने में असमर्थ रही। हालांकि, बीच-बीच में लोकनायक बापूजी अणे, ब्रिजलाल बियाणी, वीर बापूराव हरकरे, आचार्य दांडेकर, राजाभाऊ डांगरे, जनरल मंचरशा आवारी, पूनमचंद रांका, गोधाजीवराव मुखरे, विश्वंभरदास घी वाले, सुरेश गंगराडे, हरिकिसन अग्रवाल, डॉ. ल.वा.पडोले, बाबू हरिदास आवले, मंगलचंद खंडेलवाल, बालासाहब तिरपुड़े, जांबूवंतराव धोटे, टीजी देशमुख, शंकरराव गेडाम, श्रीहरि अणे, भाऊसाहब बोबड़े जैसे नेता पृथक विदर्भ के लिए आंदोलन करते रहे।
आश्चर्य यह है कि 1983 में दांडेकर सत्यशोधन समिति ने बताया था कि विदर्भ का 1246.55 करोड़ रुपए का बैकलॉग है। इसके बावजूद विदर्भ के नेताओं की नींद नहीं खुली। अब मूल रूप से शिवसैनिक एकनाथ शिंदे और विदर्भ ( नागपुर ) निवासी देवेंद्र फडणवीस सरकार का शीतसत्र नागपुर में होने जा रहा है। क्या उम्मीद की जा सकती है कि पृथक विदर्भ के लिए आवाज फिर मुखर होगी? या मान लें कि पृथक विदर्भ की मांग फिर एक बार ढाक के तीन पात साबित होगी । भाजपा को विदर्भ की जनता को दिया हुआ आश्वासन नहीं भूलना चाहिए।
***





टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें