मराठी को शास्त्रीय दर्जा देने की मांग कर रहा महाराष्ट्र, हिंदी क्यों नहीं इसकी हकदार?

एकनाथ शिंदे (फाइल फोटो)
@ उमेश यादव 

महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना से बगावत करने वाले एकनाथ शिंदे गुट और भाजपा के गठबंधन की सरकार है। शिवसेना ने मराठी अस्मिता और 'मराठी माणुस' की राजनीति की है। मुख्यमंत्री शिंदे शिवसेना की मूल आत्मा से अलग नहीं होना चाहते हैं। इसलिए वे मराठी स्वाभिमान को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। मुख्यमंत्री शिंदे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर मराठी को शास्त्रीय भाषा का दर्जा देने की मंजूरी प्रदान करने का अनुरोध किया है। यह मामला केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के पास लंबित है। प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में शिंदे ने कहा कि राज्य सरकार ने इस मुद्दे पर केंद्र को 16 नवंबर, 2013 को विस्तृत प्रस्ताव भेजा था।

मुख्यमंत्री शिंदे ने लिखा, ‘ महाराष्ट्र राज्य प्रस्ताव की स्थिति को लेकर नियमित रूप से केंद्र के संपर्क में है। इस मांग के समर्थन में राज्य के लोगों ने हस्ताक्षर अभियान चलाकर 1.20 लाख लोगों के हस्ताक्षर लिए थे, जिसे राष्ट्रपति के पास भेजा गया था।' दरअसल, केंद्रीय संस्कृति मंत्री जी. किशन रेड्डी ने इस साल 3 फरवरी को राज्यसभा को सूचित किया था कि प्रस्ताव विचाराधीन है। शिंदे ने कहा, ‘यह प्रस्ताव लंबे समय से विचाराधीन है। मैं जल्द से जल्द प्रस्ताव को मंजूरी दिए जाने का अनुरोध करता हूं।’

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कई लोगों के मन में सवाल होगा कि जब मराठी को शास्त्रीय दर्जा देने पर जोर  दिया जा रहा है, तब हिंदी को यह सम्मान देने की कोशिश क्यों नहीं की जा रही? यह समझने के लिए कुछ बातें समझनी होगी। बतातें चले कि करीब ढाई साल पहले अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन का 93वां संस्करण संपन्न हुआ था। इसमें मराठी को शास्त्रीय भाषा के रूप में घोषित करने की मांग करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया गया था। अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन मराठी लेखकों का वार्षिक सम्मेलन है। इसकी शुरुआत 1878 में की गई थी। सम्मेलन की अध्यक्षता साहित्यकार, पर्यावरणविद और कैथोलिक पादरी फ्रांसिस दी ब्रिटो ने की थी। वे इस सम्मेलन की अध्यक्षता करने वाले पहले ईसाई व्यक्ति थे।

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वर्तमान में छह भाषाओं को 2004- 2014 तक शास्त्रीय भाषा का दर्जा प्रदान किया गया है। ये भाषाएं हैं- तमिल (2004), संस्कृत (2005), कन्नड़ (2008), तेलुगु (2008), मलयालम (2013) और ओडिया (2014)। फरवरी 2014 में संस्कृति मंत्रालय ने किसी भाषा को 'शास्त्रीय' घोषित करने के लिए दिशा निर्देश जारी किए थे। इसमें कहा गया था कि उसी भाषा को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया जाएगा, जिसके प्रारंभिक ग्रंथों का इतिहास 1500-2000 वर्ष से अधिक पुराना हो, जो प्राचीन साहित्य या ग्रंथों का हिस्सा हो, जिसे बोलने वाले लोगों की पीढ़ियां मूल्यवान विरासत मानती हो। उस भाषा की साहित्यिक परंपरा में मौलिकता हो। यह ध्यान देना जरूरी है कि आधुनिक भाषा और साहित्य से शास्त्रीय भाषा एवं साहित्य भिन्न हैं। इसलिए इसके बाद के रूपों के बीच असमानता भी हो सकती है। 

अपनी आयु के कारण हिंदी अभी शास्त्रीय भाषा का दर्जा प्राप्त करने की पात्र नहीं है। हिंदी साहित्य का इतिहास वीरगाथा काल से माना जाता है। यह वीरगाथा काल वर्ष 1050 से शुरु हुआ था। इस लिहाज से हिंदी साहित्य का इतिहास करीब 1000 वर्ष पुराना है। इस तरह यह अभी शास्त्रीय भाषा का दर्जा प्राप्त करने की पात्रता नहीं रखती। 

शास्त्रीय दर्जा प्राप्त होने के बाद संबंधित भाषा को कई लाभ मिलते हैं। इसमें संबंधित भाषा के प्रख्यात विद्वानों के लिए दो प्रमुख वार्षिक अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार रखे गए हैं। इसके अलावा संबंधित भाषा में अध्ययन के लिए उत्कृष्टता केंद्र की स्थापना, केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शास्त्रीय भाषाओं के लिए पेशेवर अध्यक्षों के कुछ पद घोषित करने का प्रावधान है।

वर्ष 2019 में संस्कृति मंत्रालय ने उन संस्थानों को सूचीबद्ध किया था, जो शास्त्रीय भाषाओं के लिये समर्पित हैं। इनमें संस्कृत के लिए राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली, महर्षि सांदीपनी राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान, उज्जैन, राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ, तिरुपति और श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ नई दिल्ली शामिल हैं। वहीं, तेलुगु और कन्नड़ के अध्ययन के लिए केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान में उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किया गया। तमिल के लिए सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ क्लासिकल तमिल चेन्नई स्थापित है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग इन भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए अनुसंधान परियोजनाएं संचालित करता है। 

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